जो बीज मैंने बोया
उसमें से अंकुर फूटे ही नहीं
जिस मिट्टी में बोया था
वह रेतीली थी
सूखी थी
बंजर थी
पथरीली थी
उपजाऊ नहीं थी
उस जमीन के टुकड़े के ऊपर जो
आकाश था
वहां बादल छाते थे लेकिन
बरसते नहीं थे
मैं आदमी शायद ठीक था पर
मैंने बीज बोने के लिए
स्थान गलत चुना
मेरा निर्णय सही नहीं था या
फिर मेरे साधन सीमित थे
इसके पीछे के कारण बेशुमार हो सकते हैं लेकिन
यह सब कितना दुखद है कि
मेरे द्वारा बोया गया बीज कभी एक
वयस्क पेड़ बन ही न पाया
इस दुनिया ने
तत्पश्चात इस प्रकृति ने भी कभी
मुझ पर रहम नहीं किया
मुझे हमेशा आवारा हवाओं सा
दर दर भटकने के लिए
तन्हा ही छोड़े रखा।
0 Comments