पर्वत के इस पार खड़ी
मैं सोच रही कि
काश! पर्वत मुझे पुकार ले और
मैं देखूं उसे दूर खड़ी न होकर
पास से
उसे छूकर
बहुत ही ज्यादा करीब से
उसे गले लगाकर पूछूं
उसका हाल
उसकी अंगुली कसकर पकडूं और
उससे निवेदन करूं कि
मेरे साथ चलने की थोड़ी
कोशिश करो ना
चलो आहिस्ता आहिस्ता खिसककर
चलते हुए घूमकर आते हैं
गांव से घिरी घाटियों के उस पार।
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