एक बहती हुई नदी और
उसका किनारा
किसे अच्छा नहीं लगता होगा
नदी का नीला जल
उसमें पड़ती नीले आकाश की
परछाई
चारों ओर उसके फैली
हरियाली
उसकी भी हरी परछाई
घुल जाये नीली परछाई में तो
एक सुंदर चित्र तो अंकित होता ही है
एक प्राकृतिक वातावरण
नदी के किनारे पर
होता ही है
पक्षी आकाश से उतरकर
इसके सानिध्य में खुद को पाकर
प्रसन्न मुद्रा में भ्रमण करते
दिखते हैं
तन को,
मन को,
आत्मा को
नदी के जल की शीतलता सा ही
अहसास होता है
नदी के किनारे
एक सौम्यता लिये
शुद्ध वातावरण का आभास
होता है
यही वह स्थान होता है जहां
कोई मौन रहकर खुद के
अंतर्मन को टटोल सकता है और
नदी के बहते जल की
लहरों को स्पर्श करके
प्रभु के आसपास ही कहीं होने का
अनुभव प्राप्त कर सकता है।
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