किश्ती तुम किनारे पर खड़ी रहो


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किश्ती
तुम किनारे पर ही खड़ी रहो
क्या करोगी
जल की गहराई को नापकर या
आसमान की ऊंचाई को पहचानकर या
पहाड़ियों के शिखर पर जमी बर्फ को पिघलाकर या
हरी भरी वादियों की हरियाली के रहस्यों को जानकर या
बादलों के श्वेत रंगों में घुलते आकाश के नीले रंगों के मध्य चल रहे रिश्ते की कहानी को समझकर
कोई भी कदम तुम जो बढ़ाओगी तो
मझधार में फंसने का जोखिम तो अवश्य ही फिर उठाओगी
जब तक न हो कोई आवश्यकता या मजबूरी
मेरी समझ से बाहर है कि
तुम खामोशी से अपनी जगह
बिना हिले डुले आखिरकार स्थिर खड़ी क्यों नहीं
रह सकती।


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