एक चांद सा मुस्कुराता


0

तुम जब हो ही नहीं तो
दरवाजे पर दस्तक कहां से दोगे
लेकिन
दरवाजे पर जो भी दस्तक
होती है तो
उम्मीद यही मन में जगती है कि
वो तुम ही हो
काश यह मुमकिन हो जाये कि
हवाओं की खुशबुओं में
घुलकर तेरे किरदार का
कोई अक्स
दरवाजे की दरारों से
अंदर सरकता हुआ
मेरे जिस्म के लिबास के
करीब तक पहुंच जाये
कायनात के हर कण में
तू समा जाये और
मैं जहां देखूं
वहां तू मुझे
एक चांद सा मुस्कुराता
दिख जाये
अगली बार से तू
घर के दरवाजे पर दस्तक न देकर
मेरे दिल के दरवाजे की
कुंडी खटखटाये और
मेरे दिल की धड़कनों का शोर जो बढ़े तो
मुझे तेरा मेरे बेहद करीब होने का पता पड़ जाये।


Like it? Share with your friends!

0

0 Comments

Choose A Format
Story
Formatted Text with Embeds and Visuals