विदाई का गीत पत्तियां गा रही थीं


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पतझड़ का मौसम था
पत्तों का
पेड़ की डाल से जुदा होकर
एक-एक करके या
एक साथ या
एक के पीछे दूसरा
दूसरे के पीछे तीसरा
इस तरह एक कतार में सीधे तो
कभी आड़े तिरछे
जमीन पर गिरना तय था
पत्तियों ने अपना जीवन
भरपूर जी लिया था
उनके प्रस्थान का समय
संभवतः आ चुका था
उनका दर्द उनके
दिल से निकलते एक गीत
की लय से छलक रहा था
वह हंसें या रोयें
यह निर्णय लेने में
वह खुद को असमर्थ महसूस
कर रहीं थीं
जीवन से मृत्यु
मृत्यु से फिर एक नया जन्म तो
वह अवश्य लेंगी
विदाई का गीत वह पत्तियां
सब एक साथ मिलकर गा रही थीं लेकिन
मन में उनके
उम्मीद की भी एक किरण थी कि
यह अंत अंतिम नहीं अपितु
उनके एक नये जीवन का आरंभ
एक नये सिरे से अवश्य करेगा
हमेशा एक गीत गुनगुनाते रहना
लय में गाना
सदैव प्रसन्न रहना
ऐसा व्यवहार दर्शाने में भी
कोई हर्ज नहीं
यह गहरी जीवन दर्शन की
गुढ़ सच्चाई वह समझ चुकी थी।


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