तुम स्वयं गाओ अपनी प्रशंसा के गीत


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जीवन भर
तुमने कार्य तो महान किये लेकिन
तुम गुमनामी के अंधेरे में
क्यों खो गये
तुमने अपने कानों से
अपनी प्रशंसा के दो शब्द भी
किसी के मुंह से संभवतः  
उम्र भर नहीं सुने
तुम कर्तव्यनिष्ठता से
अपने पथ पर आगे बढ़ते रहे
तुमने कभी किसी से
कुछ पाने की उम्मीद नहीं बांधी
न जाने कितनी आंखें थीं
जिन्होंने तुम्हारे अप्रतिम कार्यों
को देखा लेकिन
तुम्हें कभी सराहा नहीं
यह भूल जो उन्होंने करी
उसकी सजा तुम कभी खुद को
मत देना
तुम अपने योगदान की
प्रशंसा के गीत स्वयं गाओ
खुद की पीठ ठोको
खुद को शाबाशी देते कभी
मत थको
अपनी नजरें खुद पर डालो
अपने अतीत के दर्पण में
खिले फूलों की तरफ देखो
और मुस्कुराओ
यह तुम्हारे कर्मों का फल है
इसके हकदार अकेले तुम हो
इसकी सफलता का सेहरा
अपने सिर आगे बढ़कर
खुद बांधो
कोई तुम्हें प्रेरित करे या न करे
स्वयं को एक उत्साह के
तेज वेग से निरंतर
स्थाई तौर पर आजीवन
भरते चलो।


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