उस पेड़ का
वह आखिरी पत्ता था
यह किसी भी पल
उससे जुदा हो सकता था
इस प्रक्रिया का होना स्वाभाविक था क्योंकि
यह पतझड़ का मौसम था
यह शरत्काल उस पेड़ का
अस्तित्व उजागर करता था
उससे उसका परिचय
करवाता था
उससे उसकी मुलाकात
उसको उसके घर का पता याद
दिलवाता था
उसकी देह को उसकी आत्मा
के समीप ले जाता था
इस विघटनकारी प्रक्रिया के दौरान भी
कितना कुछ घटित हो जाता है
जाने अनजाने लाभकारी
यह पेड़ क्या अब आगे के लिए
चिंतित हो जाये
मायूस हो जाये
हतोत्साहित हो जाये
नहीं
कदापि नहीं
यह पेड़ अपने जीवन के
अनुभवों को अभी भूला नहीं है
उसे पता है
पतझड़ के पश्चात
बहारों का आगमन होना
आवश्यक है
यह उतार-चढ़ाव तो
जीवन की एक प्राकृतिक
प्रक्रिया है
इससे भय कैसा
समय कैसा भी हो लेकिन
कुछ न कुछ सीख तो अवश्य ही
प्रदान करता है।
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