पत्ते दर्द में


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पेड़ों से पत्ते झड़ रहे हैं

जमीन की मिट्टी,

रास्ते की सतह पर बिछ रहे हैं

लोगों के पैर उनके ऊपर से

होकर

उनके बदन को छलनी करते हुए

गुजर रहे हैं

पत्ते तो पहले से ही दर्द में थे

पतझड़ की मार झेल रहे थे लेकिन

दूसरों को खुश देखकर

खुद को मिटाकर भी

कहीं बहारों को अलविदा कहने से

पहले खुश हैं

वह इस दुनिया से रुखसत हो

रहे हैं

हमेशा के लिए यहां से

जाते हुए भी उन्हें इस

दुनिया की हर चीज का ख्याल है

लेकिन

वह मर रहे हैं

जमीन पर गिर पड़े हैं

लहूलुहान हैं

छलनी हैं पर

मानव जाति को उनका न कहीं

ख्याल है

हे मानव तू जैसे अपने प्रति

सजग और संवेदनशील है

ठीक वैसा ही औरों के प्रति भी

हो जा

जैसा व्यवहार खुद से चाहता है

वैसा ही दूसरों से भी करने की

कोशिश कर।


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