हे वर्षा ऋतु


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यह जमीन सूखी है

बंजर है

प्यासी है

जैसी यह वैसा ही मैं भी

अब तो आ जाओ

आसमान से बरस जाओ

हौले हौले नहीं

तेज कदमों से आओ

मेरी बाहों में समा जाओ

मुझे अपने पाश में बांध लो

अपने प्रेम की डोर से बंधे

मोतियों के असंख्य उपहार दो

मैं कितना खुश हूं जो

तुमने मेरी मुराद पूरी करी और

बरसने लगी

मेरी पुकार जमीन से आसमान तक पहुंची और

तुम छन छन बरसने लगी

अपने स्नेह भरी रस की बौछारों से

मुझे और इस पपीहे सी  

प्यासी धरती को तरने लगी

हम सबकी प्यास बुझाने लगी

हे वर्षा ऋतु तुम्हें मेरा कोटि-कोटि

नमन, प्रणाम और

दिल खोलकर तुम्हारा स्वागत और अभिनंदन।


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