हे मां


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धरती मां
तुम्हारी कोख से ही तो
मैंने लिया है जन्म
तुम्हारी माटी से ही
मैं बनी
तुम्हारी मिट्टी में ही मुझे मिल जाना
तुम्हारी सतह पर ही मुझे चलना
तुम्हारी गोद में ही मुझे खेलना
तुम्हारी धरा पर पड़ती
सूरज की सुनहरी किरणों से
चमकते तुम्हारे कणों से ही
अपना श्रृंगार करना
तुम्हारी अनमोल देन
जो यह प्रकृति है
उसकी हरियाली और मनोहारी छटा की
शीतलता को अपनी आंखों में भरते रहना
हे मां
तुमसे मेरा रिश्ता अनोखा है
तुम नहीं तो फिर
मेरा आखिर है कौन
इस दुनिया में
मेरे मां-बाप के पश्चात
एक तुम ही तो मेरा सहारा हो
हर दुख को मेरे हर लेती हो  
तुमसे बढ़कर कोई दूजा न
मुझ दुखियारी के सुख का ठिकाना है।


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