जिंदगी में
इतना कुछ पाया है
फिर भी
माथे पर शिकन क्यों है
चेहरा मुरझाया सा क्यों है
जिस्म में थकान क्यों है
दिल की धड़कन धीमी क्यों हैं
कदमों में ताकत क्यों नहीं है
अभी तो मेरे दिल में जलते हुए चिराग को
लंबे समय तक जलना है
फिर अंधेरे में भी इसकी लौ का
बुझते हुए बिना हवाओं के
इधर-उधर डगमगाना क्यों है।
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