किताबों में जो बातें
लिखी होती हैं
वह हकीकत से परे होती हैं जैसे कि
किसी इंसान को जीने के लिए
अपने दिल को बहुत बड़ा कर लेना चाहिए
उसे इतिहास की कोई महान हस्ती सा
बर्ताव करना चाहिए
उसे सबको गले लगाकर चलना चाहिए
उसे सबकी गलतियों पर पर्दा डालते हुए
उन्हें माफ कर देना चाहिए
ऐसा करने से सबसे अधिक
फायदा खुद को होता है
यह कृत्य करने से कोई स्वयं को
इस बोझ से मुक्त हो
हल्का महसूस करता है
यह सब कहने की बातें हैं
कोई इन्हें अपनाकर अपना
जीवन सुधार सकता है तो
इसमें कोई बुराई भी नहीं लेकिन
कई बार जिंदगी में
कोई व्यक्ति कितना भी
महान क्यों न हो
दूसरों के द्वारा दी गई प्रताड़ना
वह भी अगर वो उसके अपने हों
दिल के बेहद करीब और
एक लंबे समय तक
इस तरह के निरंतर प्रहारों से
कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितना भी
मजबूत खुद को क्यों न समझता हो
आखिरकार टूट जाता है
सामने वाला उससे माफी मांगे भी तो
उसे इस पर
एकाएक विश्वास नहीं होता
दरअसल वह गुनहगार
अपना विश्वास एक लंबे समय
तक अपने दुर्व्यवहार के कारण
खो चुका होता है
माफ करने का कोई औचित्य
भी नहीं बचता
जिंदगी बस अंतिम सांसें
भर रही होती है
मौत की कगार पर खड़ी
जिंदगी
क्या समझे
क्या न समझे
यह उसकी समझ से
खुद ही परे हो जाता है
सच तो यह है कि
कोई काम ऐसा न करें
जिससे कभी शर्मिंदा होना पड़े
किसी से माफी मांगनी पड़े
माफी मांगे भी तो समय रहते
माफी मांगकर खुद के व्यवहार
को सुधारे भी
किसी की जिंदगी के आखिरी
पल में
यह माफी मांगने का
कृत्य किया भी तो
महज एक ड्रामा लगेगा
एक ढोंग लगेगा
जो होगा भुक्तभोगी
उसे किसी बोझ से मुक्ति
नहीं अपितु
उसकी मानसिक स्थिति को
और अधिक विचलित करके
उसे दुख पहुंचायेगा।
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