पत्थर बोल पड़ते हैं


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कोई भी इमारत
पत्थर की बनी
एक बेहद प्राचीन और
पुरानी सी
अपने अतीत की कहानियों को
कभी हंसकर तो
कभी रोकर
सुनाती सी प्रतीत होती हैं
इसकी आवाज
दर्द में डूबी
कराहती सी
गूंजती सी
खामोश सी लेकिन
चीखती चिल्लाती सी
सब कुछ तो बयां करती है
अपनी भावनाओं को
बखूबी व्यक्त करती है
एक लंबा समय बीत गया
लेकिन
इन कहानियों का रंग कहीं से फीका
नहीं पड़ा
जिसको इन्हें सुनकर भी
कभी नहीं समझना था
उन्होंने तो ऐसा ही
कुछ किया
जिन्हें इनके मर्म को समझना
था तो
उन्होंने आज पत्थरों पर
उकेरते उनके दर्द भरे
आंसुओं की लिखावट को भी
पढ़ लिया
युग बीत जाते हैं लेकिन
मानव संवेदनायें जस की तस
बनी रहती है
समय की बहती तेज धाराओं का
उन पर प्रभाव नहीं पड़ता
किसी दूसरे के दिल की
धड़कनों को समझने वाला
बस एक दिल चाहिए
जिंदा खामोश हो जाते हैं और
पत्थर बोल पड़ते हैं
बात बस समझने भर की है।


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