दीपक यह चांद सा


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दीपक यह चांद सा

मेरे दिल के खिलते एक अरमान सा

फूलों के मेले सा

रोशन एक आस के सवेरे सा

एक गीत गुनगुनाता हुआ

एक संगीत यह चूड़ियों की खनक सा ही खनकता हुआ

एक उपहार है

दिल की गहराइयों में जैसे बसा

हुआ किसी के लिए बेइंतहा प्यार है

एक दीपोत्सव सा

रस बरसता एक बसंत बेला सा

रंग इसमें शामिल बेशुमार है

कल्पनाओं के सपने भी हो रहे

इसके माध्यम से साकार हैं

यह दीप जल रहा एक उज्जवल लौ

के साथ

कभी ना बुझने के लिए

प्रतिबद्ध है यह तो अपने मन की परिकल्पना की एक जीवंत मूर्त सा

एक नवजीवन सा जैसे उजागर होकर निकल कर आ रहा है

इसकी अग्नि की लपक से।


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