दिल की बातें
दिल में ही रह जाती हैं
कोई ध्यानपूर्वक
दिल लगाकर
दिल के तार दिल से जोड़कर
दिल से
इत्मिनान से
सुनता नहीं तो फिर
उन बातों को
किसी बिना दिल की धड़कन के लोगों को
सुनाने की चेष्टा करने की
भूल भी करने की आवश्यकता क्या करनी।
दिल की बातें
दिल में ही रह जाती हैं
कोई ध्यानपूर्वक
दिल लगाकर
दिल के तार दिल से जोड़कर
दिल से
इत्मिनान से
सुनता नहीं तो फिर
उन बातों को
किसी बिना दिल की धड़कन के लोगों को
सुनाने की चेष्टा करने की
भूल भी करने की आवश्यकता क्या करनी।
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