रंगों की महक
न रंगों की
न फूलों की
न रंगों के उत्सव की
रंगों की महक है
तेरे तन की खुशबू की
तेरे मन की सुंदरता की
तेरी आत्मा के दर्पण की
यह रंग
न जाने कितनी सदियों से
लगे हुए हैं
मेरे तन, मन और आत्मा पर
तेरे रंग हैं तो
मेरे हर पोर में जज्ब हैं
मुझसे फिर यह छूटे कैसे
एक पल के लिए भी।
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