गर्मी के मौसम में
दिनभर की तेज धूप में
घर में रहो या
घर के बाहर
मिट्टी की यह देह
एक आग के गोले सी तप जाती है
सांझ को सूरज भी थोड़ा देर से
ढलता है
आसमान में
हल्का-हल्का अंधेरा जब
छाने लगता है
चांद भी आकाश के नीले
शामियाने से बाहर निकलकर
अपनी चांदनी बिखेरता
धीमे-धीमे स्वर में कोई राग
गुनगुनाने लगता है
हवा भी गर्म से कुछ-कुछ
ठंडी होने लगती है
पेड़ पर लगे पत्ते भी
थोड़ा-थोड़ा हिलने लगते हैं तब
इस झुलसते शरीर की
तपन को
थोड़ी सी शीतलता का आभास
होता है
छत पर बिस्तर बिछाकर
उस पर और फर्श पर
बर्फीला पानी छिड़ककर
टेबल फैन चलाकर
तारों भरे आकाश के नीचे
गर्मियों की रात बिताना
मन को अवश्य ही
सुकून देता है।
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