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कच्चे धागे: अनिल कुमार श्रीवास्तव द्वारा रचित कविता

कुछ ख्वाब सुनहरे रखे थे
कच्चे-धागों के पहरे थे, 
सहज-सलोने बचपन के पर
गांठ पुराने अपने थे।

कुछ प्यारे-से कुछ गहरे-से
कुछ रंग सितारों वाले थे, 
कुछ तुम जैसी चमकीली थीं
उनपर लम्हों के पहरे थे।

प्यारी-प्यारी शर्मीली-सी
कभी परछाईं तुम मेरी-सी, 
आंगन की सोन-चिरैया सी
कभी मतवाली चुलबुली-सी।

खिलती खिलती-सी धूप थी 
कभी साथ सुनहरी प्रीति-सी, 
कभी यादों की जंजीरों में
बहती आंखों से मोती-सी। 

माना कि याद पुरानी-सी 
बहती नदियों के पानी-सी, 
तुम दूर सदा पर यादों में 
कच्चे-धागों सी प्यारी-सी।