समय के प्रवाह में
मैं पत्थर में तब्दील हो चुकी हूं
आंख भी बन गई है पत्थर की
कितना भी दुख पड़े मुझ पर
आंसू से पर यह कभी लहराती नहीं
आसमान में घुमड़े जो बादल तो
एक बूंद बारिश की पड़ गई
मेरी आंखों में
खुद को निहारते हुए
दर्पण में मुझे लगा कि
जैसे मैं कहीं रो पड़ी
कमरे से बाहर निकली और
खुले आंगन में खड़ी होकर
तेज बरसती बारिश में भीगते हुए
मैं जी भर कर रो ली
बरसों से जो भीतर रुका पड़ा था
एक आंसुओं का सैलाब
वह एक झरने सा फूट पड़ा
बारिश की बरसती पानी की
बूंदों के साथ
मेरी आंख का आंसू ही नहीं अपितु
मेरा रोम रोम मन भरकर रो रहा था और
खुद का बोझ हल्का करके
एक सूखी धरती सा ही
गीला होकर जैसे
तृप्त हो रहा था।
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