अब मांगने को कुछ बचा ही नहीं
न कोई शिकायत, न कोई तमन्ना
न हाथ फैले हैं, न आंखें तरसीं
न गम का साया, न खुशी का नशा
न फक्र कि मैं 'कुछ' हूं
न शर्म कि मैं 'कुछ' न रही
जीत की भूख मिट गई
हार का खौफ भी दफन हो गया
मेरा मन अब एक झील है
ऐसी झील जिसमें सदियों से
कोई पत्थर गिरा ही नहीं
लहरें उठती थीं, वो भी थक गईं
इच्छाएं जलीं, फिर राख हुईं
और वो राख भी किसी आंधी में
कहां से कहां उड़ गई, पता ही न चला
और जो बचा, वो क्या बचा?
बस शून्य
पर ये शून्य खाली कोठरी नहीं है
ये तो पूरा आसमान है
ये ध्यान की वो आखिरी सीढ़ी है
जहां चढ़ते-चढ़ते 'मैं' ही गिर जाता है
वो शून्य जिसमें सारा संसार समा जाये
पर एक जरा सा अहंकार भी न टिक पाये
अब न अपने से मोह
न पराये से वैर
न वक्त की मारामारी
न मौत का इंतजार
बस एक मौन है मेरे भीतर
और वही मौन सबसे बुलंद आवाज है
वो कहता है
जब सब मिट जाता है न
तब कहीं जाकर आत्मा पैदा होती है
तब समझ आता है ये राज
कि 'कुछ न होना'
ही दुनिया में सबसे बड़ा होना है
शून्य ही सच है
शून्य ही सुकून है
शून्य ही ईश्वर का
सबसे साफ, सबसे नंगा चेहरा है।
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