परछाई मेरी थी लेकिन
मैं कहीं उसको भी पहचानने में असमर्थ
मैं खुद को भूल जाऊं
इस दुनिया को भूल जाऊं
मुझसे जुड़े सब रिश्तों को भूल जाऊं
अब तो इसी सोच का विकसित होना
मेरे लिए एक बेहतर विकल्प प्रतीत हो रहा है
मुझे नहीं बनने देनी हैं
अपनी परछाइयां कहीं पर भी
मुझे नहीं भागना रोशनी के सायों के या अंधकार की छाया के पीछे
मैं जहां हूं
जैसी हूं
जिस अवस्था में हूं
ठीक हूं
मेरी सीमा रेखाओं को स्पर्श करने की या मेरी परछाइयों पर अपने पैर रखकर
उन्हें कोई मैला करने की,
दूषित करने की या
रौंदने की कोशिश एक पल को भी करने की बस अब तो
हिम्मत न करे।
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