घर से निकलकर
चलो दुनिया की रौनक देखते हैं
भीड़ के बीच से गुजरते हुए
खुद के खोये हुए वजूद को कहीं खोजते हैं
चेहरों के लबों से जो खो गई है
मुस्कान
उसे तलाशते हैं
इस दुनिया के शोर में
जो दब गई है हर किसी की
आवाज
उसे खामोशी से बुलंद करते हैं
रास्ते भर में जो मिल रहे पत्थर,
कंकड़, कांटे
उन्हें एक-एक करके बटोरकर किनारे पे रखते हैं
हर किसी की निगाह में झांककर
उसे अपना बनाने की एक
छोटी सी कोशिश कर लेते हैं
किसी को कोई मदद चाहिए तो
उसकी यह ख्वाहिश पूरी कर देते हैं
अपने हिस्से के किस्मत के फूलों में से
जिसको जितने की हो दरकार
उसे वह तोहफे में देकर
उसकी तमन्ना को किसी
गुलिस्तां की बहार सा बना
देते हैं
सड़क के किसी चौराहे पर रुककर
पीछे मुड़कर काफिले के
हर मुसाफिर का इस्तकबाल करते हैं
जैसे उसका इंतजार था सदियों से
और वह आज मिला तुम्हें किस्मत से
उन सबको साथ लेकर फिर
आगे का सफर तय करते हैं
मंजिल मिले या न मिले यह
फिक्र छोड़कर जिंदगी के सफर को
सबके साथ मिलकर थोड़ा सा आसान और सुहाना
बनाते है।
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