क्या तलाशती हूं मैं
शाम के धुंधलकों के पीछे
खुद को
अपनों को
दुनिया को
किसी दूसरे ही जहां को
शहर को
जंगल को
भगवान को
संगीत को
शब्दों की लय को
किसी वाद्य यंत्र की तरंगों को
प्रकृति के अनुपम सौंदर्य को
जल की बहती हुई धाराओं को
आकाश को
धरती को
पशुओं को, पक्षियों को
फूलों को, तितलियों को या
कुछ भी नहीं या
फिर वही पुराने राग
पुराने लोग
पुरानी यादों के बिछड़े
सायों को।
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