कितनी कमबख्त हूं मैं कि
खुद के अलावा मैं किसी और को
जानती ही नहीं
अपने गमों को भी मैं
मोहब्बत की दुकान कहती हूं
कितनी नासमझ हूं कि
अपनी मुस्कुराहट के पीछे छिपे हुए आंसुओं को भी पहचानती नहीं।
कितनी कमबख्त हूं मैं कि
खुद के अलावा मैं किसी और को
जानती ही नहीं
अपने गमों को भी मैं
मोहब्बत की दुकान कहती हूं
कितनी नासमझ हूं कि
अपनी मुस्कुराहट के पीछे छिपे हुए आंसुओं को भी पहचानती नहीं।
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