Ummeed- Maa ki Lau: A poem by Mani Saxena


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 वर्षों सेइंतज़ारकीअग्निमेंजोअखंडजलरही,
तेरे आनेकीचाहतमेंजोकभीभीबुझसकी,
उम्मीद कादियाजलागयीतीलीइकमाचिसकी,
बरसों सेजोतपरहीएकलौमाँकीउम्मीदकी
हो तूफ़ानयासन्नाटेकोचीरतीतेज़हवाआँधीकी,
या बिनबादलमूसलाधारबरसतीबारिशकीनदीसी,
स्वयं ईश्वरबजारहेंहोचाहेंशंकनादप्रलयकी,
पर डगमगासकाकोई,एक लौमाँकीउम्मीदकी
मौसम गुज़रेऋतुएँनिकलींसमयकीहरचोटबदली,
उम्र सेपहलेउम्रकेहरदौरसेगुज़रीलौतेरेइंतज़ारकी,
कभी दियेकीरौशनीसीसजतीकभीधधकतींअंगारोंसी,
कभी सुलगतीकभीमचलतीएकलौमाँकीउम्मीदकी
कालचक्र कापहियासरकावक़्तबदलतीसुइयाँघड़ीकी,
विश्वास कीआसकोपूराकरतींप्यासतेरीयुगोंयुगोंकी,
जानती थीमैंअटलदृढ़तापरमेरेघुटनेटेकेगाकालभी,
तू आएगाज़रूरआख़िरतूहैएकलौमाँकीउम्मीदकी






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