Aprateem: A poem by Bhargavi Ravindra
पधारो ऋतुराज वसंत अधिप तुम अनन्त फैला दिगदिगनत ! तुम्हारा ये अनुपम सौंदर्य वीणा का सुर माधुर्य सुकोमल कौमार्य ! दूर तक छटा मनोहारी रंग बरसे क्यारी क्यारी अबीर गुलाल छवि प्यारी ! बरसे रिमझिम फुहार बन में पपीहे की गुहार अवनी पर रंगों की बौछार ! मिलन यामिनी अप्रतिम मुखरित शाम हुई स्वर्णिम सूर्यास्त की बेला अरुणिम। बहती जलधारा अविरल खगवृंद का मधुर कोलाहल जीवन का सुंदर समतल ।