• Matritva: A poem by Manisha Amol

    मेरी ज़िंदगी की दरख़्त को,कुछ सींचा इस तरह;जड़ों को मज़बूत किया,और फैलाया जिस तरह;ऐसी उर्वरक मिट्टी में रोपा, कि मैं पनपती रहूँ;वक़्त पे खाद और...

  • Matritva: A poem by Manisha Amol

    मेरी ज़िंदगी की दरख़्त को,कुछ सींचा इस तरह;जड़ों को मज़बूत किया,और फैलाया जिस तरह;ऐसी उर्वरक मिट्टी में रोपा, कि मैं पनपती रहूँ;वक़्त पे खाद और...

  • Mausam: A poem by Rajkumar Gupta

      हर मौसम की अपनी ही बोली अपनी ही जुबानी है,जानी–पहचानी है प्रकृति फिर भी लगता है अनजानी है,मन मे हिलोरे उठ रहीं और यादों...

  • Mausam: A poem by Rajkumar Gupta

      हर मौसम की अपनी ही बोली अपनी ही जुबानी है,जानी–पहचानी है प्रकृति फिर भी लगता है अनजानी है,मन मे हिलोरे उठ रहीं और यादों...

  • Anurodh: A poem by Rajni Sardana

      हे! धरती के जन, ना फैलाओ प्रदूषण, अस्त व्यस्त हों जायेगा,ये पर्यावरण, ये जन जीवन  है सुन्दर छटा प्रकृति की, रूद्र रूप में आ जायेगी,...

  • Anurodh: A poem by Rajni Sardana

      हे! धरती के जन, ना फैलाओ प्रदूषण, अस्त व्यस्त हों जायेगा,ये पर्यावरण, ये जन जीवन  है सुन्दर छटा प्रकृति की, रूद्र रूप में आ जायेगी,...

  • Mausam: A poem by Rajni Sardana

    कुदरत की रची सृष्टि में मौसम बदलते रहते हैं  गर्म-सर्द,सूखे-गीले का अहसास कराते रहते हैं इन सब में मुझको ऋतुराज बसंत बहुत है भाता जब...

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