• Gulaal: A poem by Dr. Charu Kapoor

    अबीर गुलाल मोहे कुछ न भाए टेसू पलाश जी भर अब सताए नयनों में कारे बदरा हैं छाए फागुन आया, संग तुम न आए रंगों...

  • Gulaal: A poem by Nisha Tandon

    बीत गए ना जाने सावन कितने एक अधूरी आस में  तोड़ कर बिखेर दिया हमें तेरी जुदाई के एहसास ने  नज़रें ढूँढती रही तुम्हें फ़िज़ा में फैले हुए हर रंग में  रंगते थे गुलाबी तुम मुझे जब हुआ करते थे हम संग में  रंगों से भरते थे ज़िंदगी हमारी हर दिन तब होली थी  निकल जाएँ जिस रास्ते से लगता था मस्तानों की टोली थी  साथ में थे तुम तो रंगों के मायने ही कुछ और थे  हर दिन एक नया त्योहार , वो भी अनोखे दौर थे  तेरे जाने के बाद भी हर होली पर आसमान रंगते दिखा है  पर बिन तेरे अब हर होली सूनी और हर रंग फीका है वक़्त बीत गया और होली एक बार फिर नए ख़्वाब लेकर आ गयी  हर तरफ़ उल्लास और ख़ुशियों की बदरा छा गई  इश्क़ का कहीं लाल तो कहीं ख़्वाबों का पीला रंग छाया है हरियाली को चीरता हुआ नीला रंग ना जाने कहाँ से चला आया है  तुमने हमेशा चाहा कि मेरे जहाँ में हर रंग का बसेरा हो  डूब जाए सूरज भले ही, पर हर दिन नया सवेरा हो ...

  • Gulaal: A poem by Priti Patwardhan

    लाल पीले हरे गुलाबी है रंगबिरंगे गुलाल ये गुलाल अब कर रहें हैं मुझसे कई सवाल बिखर रहें  फर्श पर करते बेतरतीब सी बातें चूर...

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