दुख की परछाई को
दर्द छलकता हो जो आंखों से तो लबों से मुस्कुरा दो जीने की कला सीखते रहो उम्र भर हर किसी से और दुख के घर...
दर्द छलकता हो जो आंखों से तो लबों से मुस्कुरा दो जीने की कला सीखते रहो उम्र भर हर किसी से और दुख के घर...
सावन की रिमझिम फुहार पेड़ की डाली पर पड़े झूले में झूलते हुए मेरे साजन मुझे रह रहकर बहुत आयें याद आसमान से उतरकर जैसे...
कितनी भी कोशिश करो कि जो कहानी दिल में चल रही है वह मेरे चेहरे पर कहीं दिखाई न पड़े लेकिन क्या करूं यह दुनिया...
बच्चे खुश हैं क्योंकि वह सब खुले आसमान में सांस लेते खेलते कूदते पतंग उड़ाते तितलियों के पीछे भागते झूला झूलते हरे-भरे पेड़ों के बीच...
उम्मीद के रंगों से खुद को रंग दो और एक तितली बन जाओ फूलों पर ही न मंडराती रह जाना हवाओं संग उड़ जाओ और...
बारिश की एक बूंद जो पड़ी हमारी चितवन पर तो हमें एक गंगाजल की पवित्र धार की बौछार सा नहला गई मन के रेगिस्तान की...
किसी गुब्बारे बेचने वाले से तुम एक गुब्बारे की कीमत क्या पूछते हो वह जितना कहे उसे दे दो पांच की जगह दस दस की...
मेरे कमरे की हर खिड़की पर पड़ा हुआ एक पर्दा इधर देखूं इधर भी पर्दा उधर देखूं उधर भी पर्दा आगे देखूं आगे पर्दा पीछे...
यह पर्दा झीना सा है बहुत ही सुंदर है हल्के रंग के फूलों के प्रिंट का है इसके पार सब कुछ दिख जाता है यह...
मां की चूड़ियां मैं जब पहनती हूं अपने हाथों में तो वह आज भी खनकती हैं लेकिन मेरी मां की आवाज मेरे कानों को नहीं...
वह फूल उस बाग का आखिरी फूल था वह पत्ती उस फूल की आखिरी पत्ती थी उस बाग पर पतझड़ के मौसम की मार थी...
मेरी दुनिया मेरे मां बाप और मेरा कमरा।