कितनी कमबख्त हूं मैं
कितनी कमबख्त हूं मैं कि खुद के अलावा मैं किसी और को जानती ही नहीं अपने गमों को भी मैं मोहब्बत की दुकान कहती हूं...
कितनी कमबख्त हूं मैं कि खुद के अलावा मैं किसी और को जानती ही नहीं अपने गमों को भी मैं मोहब्बत की दुकान कहती हूं...
दिल बोलता है कलम लिखती है स्याही बिखेरती है कागज समेटता है जो कोई मेरे लिखे कलाम को पढ़ता है क्या वह मेरे दिल में...
घर से निकलकर चलो दुनिया की रौनक देखते हैं भीड़ के बीच से गुजरते हुए खुद के खोये हुए वजूद को कहीं खोजते हैं चेहरों...
नीला आसमां नीली मेरी आंखें भी नील नदी सी।
आसमान से उतरकर सूरज तुम आज आ जाओ ना मेरे पास लेकिन मुझे जला मत देना मेरे भीतर निहित बुराइयों को बेशक जला देना लेकिन...
क्या कहूं कई बार कुछ भी समझ नहीं आता आवाजों के शोर में सच्चाई की आवाज दब गई है उसे कोई सुनता नहीं कोई सुनना...
तुम्हें क्या लगता है कि मैं कोई कपड़ा सिल रही हूं और उससे किसी के लिए कोई परिधान बना रही हूं हो सकता है कि...
कठिन है पथ पथरीला सिर पर गठरी का बोझ है भारी धूप घनेरी प्यास है गहरी आहिस्ता आहिस्ता पग धरो साथ चलो बतियाती चलो मिलजुल...
जिंदगी उतनी ही समझ जाती है जितनी तुम्हें जीने के लिए मिली होती है काश यह एक ख्वाब सी होती एक दुआ सी पूरी होती...
मेरा दिल तो है एक मोम सा न जाने कैसे जी पायेगा इस पत्थर दिल दुनिया में सांसों का दरिया भी बहता रहे जो एक...
कहानियां बहुत हैं सुनाने के लिए लिखने जो बैठी तो कलम की स्याही और कागज के टुकड़ों की कतरनें कम पड़ जायेंगी दर्द भरी कहानियों...
घर से निकालो बाहर कदम जो बाल्यावस्था में तो किसी के जीवन की शुरुआत उसके विद्यालय से ही तो होती है उस विद्यालय का अध्यापक...