जिंदगी एक सफर और मौत इसका एक चरम बिंदु
एक खिड़की खुली है, दूसरी बंद है रास्ते हजार हैं लेकिन मंजिल एक है मेरा साया यूं तो है मेरे साथ लेकिन कहने को मुसाफिर...
एक खिड़की खुली है, दूसरी बंद है रास्ते हजार हैं लेकिन मंजिल एक है मेरा साया यूं तो है मेरे साथ लेकिन कहने को मुसाफिर...
जल तरंग संग इंद्रधनुष मुझे प्यारे।
जब तक मैं तब तक तू और तेरी याद भी।
मैं क्यों खुश करूं कभी इसको कभी उसको सारी उम्र ऐसे ही निकल जायेगी किसी के लिए कितना भी कुछ कोई क्यों न कर ले...
पूरी तरह से ठीक होकर, स्वस्थ होकर वापस अपने घर जाओ कोई भी चिकित्सक हमेशा यही चाहे कि उसका मरीज हंसते, मुस्कुराते, खिलखिलाते, खेलते कूदते...
कुछ लोगों को शांति से ज्यादा शोर पसंद होता है सुगंधित बहती हवायें उन्हें अच्छी नहीं लगती धूल भरी तेज आंधियां जो थोड़ा बहुत नुकसान...
किसी का कभी दिल न टूटे किसी की मोहब्बत उससे कभी न रूठे जिंदगी रहते हुए भी जिंदगी का साथ न छूटे अपनों के होते...
जिस घर में मैं रहती हूं जो मेरे मां-बाप का घर है जहां मैं पैदा हुई जहां मेरा बचपन बीता जिस घर के जर्रे जर्रे...
किसी के हो या न हो लेकिन मेरे बिस्तर के नीचे तो एक राक्षस स्थाई रूप से रहता है शाम का धुंधलका रात के अंधियारे...
आवेश में आकर तुम कुछ गलत काम को अंजाम मत दे देना ओ पथिक वह कृत्य कहीं इस हद तक गलत न हो कि तुम्हें...
मुझे लगता है कि मैं खुद में ठीक हूं खुद से संतुष्ट हूं खुद से मुझे कोई शिकायत नहीं खुद से मैं खफा नहीं खुद...
स्वत: ही कभी खुलती हूं, कभी सिकुड़ती हूं न जाने कौन बला हूं मैं कभी खुद से मिलती तो कभी बिछड़ती हूं मैं।