मेरा मन
रेगिस्तान में प्यासे भटक रहे
एक हिरण सा ही तो है जो
पानी की प्यास से बेहाल है
जिसे बस पानी की तलाश है
जिसे बस चारों तरफ
पानी ही पानी दिखता है
रेत से भरे रेगिस्तान में भी
पानी से भरा एक समुन्दर
दिखता है
जिस तरफ अपनी आंख उठाकर
देखता है
वहीं उसे तो एक बारिश
की बूंदें टपकाता
बादल का कोई टुकड़ा
दिखता है
मेरी चाह पानी की
कितनी छोटी सी है
फिर भी पूरी कहां हो रही है
इसे पूरा कर पाना
कोई असंभव कार्य तो नहीं है लेकिन
फिर वही अधूरा प्रश्न
यह संभव होते कहां दिख रहा है
मृगतृष्णा के जाल में फंसा
मेरा मन
जल बिन एक मछली सा ही
छटपटाता है
कहीं कुछ भी तो पूर्ण नहीं लेकिन
अपूर्णता भरी आशंकाओं से
घिरा मेरा चंचल मन फिर भी
संपूर्णता और संभवता को ही
उम्र भर तलाशता है।
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