हर दरख्त की टहनी पर
फूल खिले हैं और
फल लदे हैं
दिन के उजाले में
रात के अंधियारे में
परिंदों का कौतूहल है
कोयल कूक रही है
मयूर नृत्य कर रहे हैं
तितलियां, भंवरे आदि कलियों पर मंडरा रहे हैं
हवा सुहानी चल रही है
नदी भी शोर मचाती कलकल
कर रही है
सुबह शाम शहर के सारे लोग
बाग में टहलने के लिए आ रहे हैं
आपस में बतिया रहे हैं
प्रीत के गीत गा रहे हैं
एक स्वच्छ सुंदर मनोहरी वातावरण है चारों तरफ
कौन करेगा इस बात से फिर इंकार कि बागों में बहार नहीं है।
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