रेशम के धागों से बुनी
एक रेशमी अहसास
दिलों में जगाती
एक रेशमी कृति हूं मैं
सिर से पांव तक
रेशम के जज्बातों से हूं सराबोर मैं
तुम सब मुझे देखकर
ईर्ष्या क्यों करते हो
मेरे मन की सुंदरता को बर्दाश्त क्यों नहीं
कर पाते
मेरी सच्चाई पर शक क्यों करते हो
मैं सच के मार्ग पर एक चिकने रेशम सी ही
फिसलती चली जाती हूं
तुम मुझे उस पथ से क्यों डिगाते हो
मैं एक रेशम के फूल सी अति कोमल
तुम मुझे अपनी मेरे प्रति
मन में भरी दुर्भावनाओं का कांटा
क्यों चुभाते हो।
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