खुद के आगोश में


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खुद के आगोश में
जब कोई सिमटता है तो
खुद को पाता है
इस दुनिया को समझ पाता है और
खुदा के घर का पता भी
उसे मिल पाता है
फूलों के उपवन में जाने की
आवश्यकता फिर उसे नहीं पड़ती
उसके जिस्म का जर्रा जर्रा ही
फूलों की सुगंध से महक जाता है
किसी की मीठी चाशनी सी बातों की जरूरत
उसे फिर महसूस नहीं होती
उसका रोम रोम ही एक चंदन बन की
सुगंध बिखेरता तपोवन बन जाता है
किसी के ममता भरे स्पर्श की उसे फिर
कोई चाह नहीं रहती
उसका हृदय एक विशाल प्रेम का अमृत
छलकाता सागर बन जाता है
किसी का अपनत्व
किसी की सहानुभूति
किसी का प्रेम
किसी का वैभव
किसी की दौलत
उसे ऐसा कुछ भी नहीं चाहिए
उसके मन मंदिर में तो एक आस्था का
दीपक प्रभु की भक्ति से परिपूर्ण जागृत हो
जाता है
इस अवस्था में किसी पूजा स्थल पर
जाने का भी कोई औचित्य नहीं रह जाता
भगवान स्वयं करें जब किसी के
मन में वास तो
उन्हें दर-दर भटककर
इस बाहरी दुनिया में तलाशने की
बिल्कुल भी कोई अनिवार्यता नहीं।


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