समुन्दर के अंतर्मन की तड़प सी


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समुन्दर किनारे टहल रही थी
सांझ के समय
ढलते हुए सूरज से कुछ दिल की बातें
करते हुए तो
कानों को सुनाई पड़ रही थी
दूर से आती एक गूंजती हुई आवाज
यह शोर लहरों का
मेरे मन की खामोशी को तोड़ रहा था
मेरे दिल में धड़कनों की धुन का
एक साज सा जैसे बजने लगा था
वह समुन्दर के किसी आखिरी छोर से आती गूंजती आवाज
मेरे मस्तिष्क के पटल पर
अपनी ही तरंगों की एक छवि सा
बनाने का प्रयास कर रही थी
ऐसा लग रहा था जैसे लहरें
चट्टानों से बार-बार टकराती हैं और
अपनी जिंदगी की कहानी को
कई टुकड़ों में करके उसे सुनाती हैं
ऐसा मालूम होता था जैसे कि
कोई माझी भटका सा
विरह के गीत रुंधे गले से
समुन्दर के पानी को सुनाता हो
यह गूंज तो समुन्दर के
अंतर्मन की तड़प सी थी
पानी संग रहकर भी
जैसे कोई मछली इसकी
साथी बिना बात बैचेन हो
यह दूर से आती ज्वार की
गूंज थी जो
पुकार रही थी समुन्दर किनारे
टहलते या
उसके पानी पर तैरते मुसाफिरों को
उनकी जिंदगी से कहीं दूर ले जाकर
उन्हें एक अनंत यात्रा पर ले जाना चाहती थी
जहां वह खामोशी से
सुने और समझने की
चेष्टा करें
उनके अंतहीन दर्द की गूंज की पराकाष्ठा को।


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