शरद ऋतु में
चांद की चांदनी
एक चांदी के नुकीले तार सी
देह में बसी आत्मा में
चुभ रही है
मैंने किया था
सदियों तुम्हारा इंतजार
तुम्हारी बाट जोहती रही
उम्र भर और
हर रोज मैंने किया
सोलह श्रृंगार
चांद ने कभी लेकिन
नहीं किया अपनी चांदनी का दीदार
श्रृंगार मेरा एक पतझड़ के मौसम में
पेड़ से झड़ रहे पत्तों सा ही झड़ गया
इधर-उधर
यहां वहां
न जाने कहां कहां बिखर गया
चांद यह भीतर से भी
पत्थर दिल एक सफेद चट्टान सा ही निकला
अपनी चांदनी के बिखराव को
इसने न समेटा।
0 Comments