भौतिकतावाद में
जो मनुष्य एक हद से ज्यादा
हर समय फंसा रहता है
उसका जीवन मनुष्य योनि प्राप्त
करने के बावजूद
एक सामान्य जीव जंतु सा ही व्यतीत
हो जाता है
उसका जीवन अंत में निरर्थक
साबित होता है
उसके हाथ आखिरकार कुछ नहीं लगता
दुनियावी सुख और सफलताएं
थोड़ी बहुत तो आवश्यक हैं लेकिन
यह व्यक्ति को परम आनंद की अनुभूति
प्रदान नहीं कर सकती हैं
परम आनंद एक मानसिक
स्थिति है जो कोई मनुष्य चाहे तो
अपने सार्थक प्रयासों से उसे
प्राप्त कर सकता है
यह उसकी अपनी एक प्रसन्नता
और संतुष्टि के भाव को प्राप्त
करने की आंतरिक यात्रा है
उसे जो भी प्राप्त होता है
जिस स्रोत से भी मिलता हो
सबसे पहले तो उसके प्रति
अपनी कृतज्ञता प्रकट करना
हृदय से
अत्यंत आवश्यक है
खुद से और प्रकृति के हर कण से
प्रेम करने से आंतरिक शांति
और संतोष अवश्य मन की
गहराइयों में जागृत होगा
समस्त जीवों और प्रकृति
के प्रति गहरा प्रेम महसूस करना और
हृदय का करुणा से भरा
रहना परमानंद की
स्थिति को दर्शाता है
परमानंद में मुक्ति का अनुभव
होता है
इस स्थिति में 'मैं और तुम' का भेद मिट जाता है
वह व्यक्ति विशेष स्वयं को
ब्रह्मांड का एक अभिन्न अंग मानता है
इस अवस्था में व्यक्ति अपना
सामान्य जीवन जीते हुए भी
हर कार्य और अनुभव को असाधारण पाता है
परमानंद की प्राप्ति से भौतिक वस्तुओं, रिश्तों और
परिणामों के प्रति आसक्ति समाप्त हो जाती है
जो लोग बाहरी और शारीरिक सुख को प्राथमिकता देते हैं
वह परमानंद की धारणा को नहीं अपना सकते हैं
जो लोग दार्शनिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से जीवन को देखते हैं
उनके लिए जीवन परमानंद है जो कि एक आंतरिक और गहन अनुभव है।
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