मुस्कुरा लिया कर
ऐ जालिम
कभी अपनों को देखकर भी
पहचान ले
समय रहते
जीवन की सच्चाइयों को
किसी तन्हा की तनहाइयों को
तेरा इंतजार देखती पत्थर में
तब्दील हो रही निगाहों की
परछाइयाों को
किसी की सच्ची बेपनाह मोहब्बत को
किसी पाकीजगी से भरे
नेक साफ एक रिश्ते को
उम्र के आखिरी पड़ाव पर
यह समझा तो फिर
कुछ हाथ नहीं आयेगा
पछतावे के सिवाय
तेरे पास कहने को कुछ और नहीं
रह जायेगा।
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