भूतों से भय कैसा
जो वर्तमान में जीवित नहीं,
मृत हैं
उनसे डर कैसा
जो आत्मायें तुम्हारे आसपास
परछाइयों सी भटकती हों
भांति भांति के
इंसानों की तरह ही भाव लिए
दर्द में डूबी
खोई खोई
तन्हा तन्हा
खुश भी
दुखी भी
उनसे खौफ कैसा
मैं भी तो देखा जाये
एक आत्मा ही हूं लेकिन
मेरा वास एक
शरीर में है और
मैं जीवित हूं
कुछ आत्मायें बिना शरीर की हैं
वह कभी दिखती हैं तो
कभी किसी को महसूस होती हैं
बनती बिगड़ती परछाइयों की आकृतियों सी
वह तुम्हारे आसपास ही
मंडराती हैं
कभी तितलियों सी
कभी भंवरों सी
कभी चमगादड़ों सी
तुम्हारे से कभी साधें वह
संपर्क तो
तुम उनसे घबराना मत
उनके अस्तित्व को सहजता से
स्वीकारना
उनका अभिवादन करते हुए
उनके साथ
उनकी पसंद का
नृत्य कर लेना
वह जब तक चाहें
उनका सहयोग कर देना
यह प्यासी आत्मायें भी तो
भटकती हैं
प्रेम की तलाश में
जिस पनघट पर मिलेगा
इन्हें पीने को पानी
वहीं तो जायेंगी
इनकी प्यास बुझा देना
इनके पास कुछ भी
तो नहीं है
इनका जीवन का उपहार भी
समय के क्रूर हाथों द्वारा
छीन लिया गया है
तुम इन्हें कुछ पलों की
खुशियों की सौगात देना
इनका मनोबल गिरने मत देना
यह समझने की चेष्टा करना कि
तुम पर होगा पूर्ण विश्वास तो ही
आयी होंगी यह
तुम्हारे द्वार
उनकी आशा भरी निगाहों में
घृणा का बाण मत भेदना
इनका मान रखना
इन्हें भरपूर स्नेह देना
इन्हें कदापि निराश मत करना।
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