रात के घने अंधकार में
काली स्याह
काली स्याही के रंग से रंगी
काली रात में
अपने शयनकक्ष की खिड़की पर पड़ा पर्दा हटाकर
मेरी तरसती आंखें कुछ खोजती हैं तो
बस आसमान के चांद को
वह पूरा हो
आधा हो या
अधूरा हो
इस बात से
मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता
कैसा भी हो
है तो वह मेरा चांद ही
मुझे देख वह मुस्कुराता है
अपनी रोशनी से मुझे
नहलाता है
अपना असीम प्यार मुझ पर
लुटाता है
इशारों इशारों में
अपने दिल की सारी कहानी
मुझे सुना देता है
मेरी अंखियों में चांदी की
सिलाई से
रात की सुरमेदानी से
उसका काजल चुराकर
परों की कोमलता सा
हौले हौले
पिरोता है
चांद मुझे बहुत प्रिय है
दूर होकर भी
मेरे दिल के बेहद करीब है
मैं भी चांद को
उतनी ही प्यारी होंगी
तभी तो
जब भी देखता है मुझे
अनायास ही मंद मंद मुस्काता है
अपने दबे होठों से।
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