काम पड़ने पर ही
अक्सर किसी को
याद किया जाता है या
अपना कोई स्वार्थ सिद्ध करने के लिए अन्यथा
क्या जीवित
क्या मृत
क्या वह लोग जो मृत्यु शैया पर हैं
आज के युग में तो
हर किसी को ही भुलाया जा रहा है
दिल पत्थर के होते जा रहे हैं
ऐसा मालूम होता है कि
वह धड़कना ही भूल गये हैं
किसी की इंसानियत
किसी की अच्छाई
किसी की शराफत
किसी की भलाई
किसी का भोलापन
किसी की मासूमियत
किसी की मोहब्बत की
परछाई
ऐसा कुछ भी तो
इन पत्थर दिल बस्तियों में रह रहे
पत्थर दिल लोगों को छूकर भी
गुजरने की जुर्रत नहीं करता
भुलाये गये लोगों की
फुसफुसाहट हो
सरसराहट हो
मौन हो
शोर हो या
दर्द हो
इन अंधे, बहरे, गूंगे,
असंवेदनशील लोगों को
कुछ नहीं दिखता
कुछ नहीं सुनता
कुछ महसूस नहीं होता
न जाने
समझ से बाहर है कि
लोग अपना जीवन यापन
किस तरीके से कर रहे हैं
मानव हैं लेकिन
मानव जैसी इनमें कोई बात
नहीं दिखती
न यह पशु हैं और
न ही मशीन
भूत पिशाच की योनि के
लगते हैं
यह भला कहां समझ
पायेंगे
भूली बिसरी यादों में
विचरती अनगिनत
मानवीय संवेदनाओं के
चित्कार भरे मौन की आहट को।
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