जुगनुओं के पीछे दौड़ना
एक दिलचस्प खेल सा
प्रतीत होता है
यह कभी एक बल्ब सा जलता है तो
कभी बुझता है
कभी मुस्कुराकर अपनी मोहब्बत का इजहार करता है तो
कभी एक बेवफा सनम की तरह
दगा सी दे जाता है
मेरे हाथ में फूल तो कभी
थमाता ही नहीं है
एक साफ सुथरे खुले मैदान में
भागता तो अच्छा लगता है
चाहे तो अकेला या
अपने साथियों के साथ लेकिन
झाड़ी में जो कुछ पलों के लिए
उलझ जाता है तो
मेरी देह पर भी कांटों के
एक जाल को चुभा देता है
चांद सा तो नहीं है लेकिन
रोशनी से तो भरा है यह
इसे पर शायद इसका
गुमान नहीं
इसके पास कहां कोई दर्पण है कि
उसमें यह अपना एक
चमकता हुआ किरदार देखे
मेरी कही बातों को
समझने लगेगा जिस दिन तो
जान जायेगा अपनी
अहमियत को,
गुणों को और
खूबसूरती को
दे देगा उस रोज
यह मुझे अपनी फिर
थोड़ी सी रोशनी उधार।
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