तुमने बहुत कुछ किया है
मेरे लिए लेकिन
मेरे मन को फिर भी न
छू पाये
सुख में तो
तुम मेरे मित्र हो लेकिन
दुख पड़ने पर
तुम मेरा साथ नहीं दोगे
क्या करूं
मेरी आंख देख लेती है
सच को
सौ पदों के पीछे भी
उन्हें बिना हटाये
अपनी जगह से
आपातकाल में
कोई शत्रु भी जो आ जाये
तुम्हारे काम
तो फिर मित्र तो सही अर्थों में
वह निकला
यह तुम्हारी बदकिस्मती थी कि
तुमने समय रहते उसे पहचान नहीं था।
0 Comments