एक समय था
जब फोन पर बजती कोई घंटी
दिल के तारों को झंकृत कर देती थी
आज के समय में
समय ही नहीं है
मन भी बुझा है
कुछ भी पहले जैसा नहीं है
फोन की घंटी जब बजती है तो
दिल की घंटी साथ में कभी बजती है तो
कभी नहीं भी
यह भी समझ नहीं आता कि
फोन पर बात करने के पश्चात
मन को शांति मिलेगी या
दिल बेवजह घबरा जायेगा
उम्र के साथ
शरीर के सारे अंग भी तो
कमजोर होने लगते हैं
उनमें वह युवाओं जैसी ताकत
कहां रहती है जैसे कि
हाथ जल्दी थक जाते हैं
कान ऊंचा सुनते लगते हैं
आंखों से कम दिखता है
वगेैरह वगेैरह
फिर भी
उम्र के चाहे
कितने भी पड़ाव कर लिये हों पार
दिल तो एक बच्चा ही है ना
फोन की घंटी बजने पर
एकाएक न सही पर
देर सवेर उत्साहित तो होता ही है।
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