फर्ज अदायगी की भी
अपनी कुछ रस्में होती हैं जो
कुछ लोग उम्र भर
जानबूझकर नहीं निभाते
रिश्तों का कत्ल कर देते हैं लेकिन
आगे बढ़कर उन्हें नहीं बचाते
जीते जागते लोगों को एक बोझ समझकर
उनकी आत्मा को जला देते हैं
अपने जिस्म का भार
सारी उम्र फिर
न जाने कैसे ढोते हैं
कितना कुछ घृणित करते हैं लेकिन
अंजान बने रहते हैं कि
जैसे कुछ जानते ही न हों
ऐसा जाने अंजाने जो न दर्शाया तो
अपने भूले बिसरे फर्जों की फेहरिस्त
आंखों के सामने खंजरों सी
फर्ज से मुंह मोड़ने वालों का
कत्ल करने पर आमदा
नाचने नहीं लगेगी।
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