अपने आंचल को
आज जरा मैं अपने आगोश में
समेट लेती हूं
मैं अपने कदमों की आगे
बढ़ती रफ्तार को थोड़ा सा
धीमा कर लेती हूं
मैं अपने घर के दरवाजे की
सांकल को भीतर से अच्छे से
कसकर बंद कर लेती हूं
मैं अपने सिर पर मंडराते
आकाश को भी मुझसे कहीं दूर
चले जाने का आग्रह करती हूं
मैं अपने कमरे की खिड़की पर
पर्दा गिरा देती हूं
मैं अपने शयनकक्ष के
रोशनदान से आती
सूरज के प्रकाश की एक
किरण को भी वापिस लौटकर
चले जाने का हुक्म देती हूं
मैं अपने पैरों के नीचे
दब रही जमीन को
एक कब्र सा तहखाने में
समा जाने का आदेश देती हूं
मैं अपने बदन से चिपके
सारे पंख उखाड़ फेंकती हूं
मैं इस संसार की समस्त
सुख सुविधाओं का परित्याग
करती हूं
मैं किसी के समक्ष
कुछ मांगने के लिए
अपनी झोली नहीं फैलाती
मैं अपने दम पर जीती हूं
मैं अपनी रची एक दुनिया
की मालकिन हूं
मैं अपने दिल पर राज
करती हूं
मैं अपने मन की अदालत में
बने कानून का पालन
करती हूं
मैं अपनी हदों में जीती हूं
मैं अपनी पनाहों में सांस
लेती हूं
मैं अपने सिमटते हुए किनारों में
एक विस्तृत क्षितिज पाती हूं।
0 Comments