कभी दिल में आता है कि
बहुत कुछ कहती चली जाऊं तो
कभी लगता है
अपने होठों को सिल लूं और
बेहतर होगा कि
खामोश हो जाऊं
न जाने किस कारण
कभी किसी स्रोत से झरने
एकदम से फूट जाते हैं
नदियों की शक्ल लेते हैं और
किसी अनजान दिशा में बहते
चले जाते हैं जबकि
उन्हें यह ज्ञात होता है भली
भांति कि
एक रोज वह अपना
अस्तित्व खो देंगे
अपनी पहचान को खुद ही
भुला देंगे
अपने रास्ते भी शायद बदल
पाने की स्थिति में नहीं होंगे
फिर भी रुकते कहां हैं
बहते हैं समय के वेग के साथ जबकि
अंततः सूख जाना होता है
उनकी नियति।
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