पगडंडी पर चलने को
दिल बेचैन है पर
इस पर चलना होगा
थोड़ा सा संभल के
यह एक कांच सी नाजुक है
कच्ची मिट्टी से बनी इसकी देह है
कमर इसकी लचकती हुई एक अपरिपक्व बेल सी ही
पतली और कोमल है
यह एक सकरी तंग गली सी है
इसके सिर पर आसमान की खुली छत और
पांव तले दलदली मिट्टी की सौंधी सौंधी
खुशबू रची बसी है
चारों तरफ इसके हरियाली का घेरा है तो
अंखियों में इसकी काली घटा का काजल
एक सखी सी है यह तो जो
चल रही मेरे संग संग
हवाओं में बहती
मेरे से बतियाती
एक बच्चों की तरह किलकारियां मारती
कभी मुस्कुराती
कभी शरमाती तो
कभी एक नई नवेली दुल्हन सी लज्जाती
इसके रूप अनेक हैं
कंचई धूप खिलती तो यह
एक सोने की दमक बिखराती
चंपा के फूल सी महक जाती
सांझ का सूरज जो ढलता तो
माटी के रंग में घुलकर
एक सांवले कान्हा की
श्याम वर्ण परछाई पड़ती उनकी
राधा सी हो जाती।
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